लोगों से अलग होना हर ईंसान की ख्वाहिश है , हम सब एक दूसरे से कई मामलों मे विभिन्नता रखते है लेकिन जब कोई व्यक्ति सुन नहीं सकता , बोल नहीं पाता , चल नहीं पाता या अन्य पैमाने पर अलग हो तो यह भिन्नता अपंगता मे बदल जाती है ।
हमारे समाज मे अपंग होना एक औरत होने से भी खराब माना जाता है और अपंग अगर स्त्री हो तो यह स्थिति बद से बदतर हो जाती ।समाज मे अपंगता का आशय दया , असहाय, और बेचारगी से लगाया जाता है ।लोगों की दृष्टि मे ये लोग बोझ और सहानुभूति के पात्र माने जाते है ।
लेकिन कहते है कि जब कुदरत कोई चीज़ छीनती है तो उसके बदले कुछ ना कुछ ऐसा देती है जो दूसरो पर न हो , बस इसी हुनर की पहचान उन्हें करनी होती है और वे इस अपंगता को वरदान मे बदल देते है और समाज को नई राह सुझाते है ।ये लोग किसी भी प्रकार की दया के मोहताज नहीं है बस इन्हें प्रेम एवं समाज मे स्वीकार्यता की आवश्यकता है जिससे ये अपने वजूद को पहचान सकें।
वास्तव मे दया के हकदार तो वो लोग जो समाज मे अराजकता को फैलते , मानवता को दागदार करते है और अपंग न होते हुए भी अपंग बने हुए है और कैंसर कोशिका की तरह समाज मे उपस्थित है ।
No comments:
Post a Comment