Thursday, 21 August 2014

माँ

        "  खुली  जब  आँख  तुझे  देखा
           ऊँगली पकड़  के  चलना  सीखा
              सीखी  तुझसे  दुनिया  दारी     
                माँ तू है जग  से प्यारी "

माँ  एक  ऐसा  शब्द  जिसमे  सारी  दुनिया  समाई  है  और  जिनके पास  माँ  होती  है  उनसे  ज्यादा  खुशनसीब  कोई नहीं  होता  । कभी  कभी  अनजाने  में  मैं  माँ  को  बहुत  हर्ट कर  देती  हूँ  जिसका  मुझे  एहसास  बाद  में  होता  है  इसीलिए  मै  आज  वो  लिखने  जा  रही  हूँ  जो  मैं   महसूस  तो  करती  हूँ  पर   कभी  कह  नहीं  पाती  और शायद अपनी  माँ  से  कभी  कह  भी  नहीं  पाउंगी।  माँ  वो  है  जो  हमेशा  से  हमे  एक  बेहतर  जिंदगी  देने  कि  कोशिश  करती  है  ।  माँ  को  चाहे  कितनी  भी  तकलीफ  हूँ  पर वो  मुझे  कभी  इस  बात  का  एहसास  तक  नहीं  होने  देती  है।  याद  आते  है वो  पल  जब  में  छोटी   थी  और मेरे एक्साम्स  होते थे।   एक्साम्स होते  तो  मेरे थे  पर  चिंता  उन्हें रहती  थी  ऑफिस  से  आने  के  बाद  सीधे उनका  मुझे पढ़ाने  बैठ  जाना  और  रात  में  मुझे  टाइम  पर सुला देना।  और  सुबह  होते   ही   छत  पर   ले  जा  के   मुझे  पढ़ाना ।   पर  शायद  अब  वो  बात  नहीं  रह  गई  है  ना   जाने  क्यों   हम  बदल  जाते  है किसी  और  के  करीब  आने  से ,   ना  जाने  क्यों  मुझे  अपने  ही  मेरे  दुश्मन  लगने  लगते  है  ना  जाने  क्यों  ???  अब  हर  चीज़  गलत  लगने  लगती  है    यहाँ  तक  मम्मी  का  करीब  रहना  भी  उनका  कोई  सवाल करना  भी  मुझे  बुरा  लगता  है  एक  चिड़चिड़ाहट  सी  होने  लगती  है  ना  जाने क्यों  ??
समझ  नहीं  आता  क्यों  भूल  जाते  है  हम  अपने  पुराने  रिश्तों  को   जो  हमारे  सबसे  ख़ास होते  है  , उन्ही  से  दूर  होने  लगते  है  किसी  और  के  लिए   हम   अनजाने  में  उन्हें दुखी  कर  देते  है  जिन्होंने   हमारे  लिए  ना  जाने  कितने  दुःख  सहे  होंगे।  

  
     "  दर्द दिए तुझे एहसास है मुझे  
        आंखों से बहते आसूं भी याद है मुझे 
        कर दी गलती कैसे मांगू माफ़ी  
        मुझको तेरी जरुरत आज भी है "

Saturday, 16 August 2014

कितने मजबूत है आपके रिश्ते ।

क्या देह की आग इतनी भयंकर हो सकती है कि जो रिश्तों को ताक पर रख दे ? और उससे भी आगे बढकर बच्चों के शोषण से भी पीछे न हटे। 
हमारे वातावरण  मे कुछ ऐसी प्रवृत्ति के लोग रह रहे है जो अपनी हवस को बुझाने के लिए कई बच्चों की उम्मीद और हौसलो के दिये को सदैव के लिए बुझा देते है , और भर देते है उनमे कुंठा , घुटन और ग्लानी ।
नज़दीकी रिश्तों मे अगर कोई लडका जब  किसी लडकी से उम्र मे 12-15 साल बडा हो और लडकी को प्रेम जाल मे फसाकर उसका यौन शोषण करता हो तो क्या माना जाए इसे । आश्चर्य तो तब होता है जब वो यौनिकता को सार्वजनिक करके लडकी का मजाक बनाता है ।
लेकिन बाल शोषण मात्र यहीं तक सीमित नहीं कई बार देखने मे आता है कि ऐसे लोग जो बच्चे के बहुत नजदीकी है या परिवार मे आते जाते रहते है भी इस घिनौने  अपराध को अंजाम देते है ।
ये बच्चों को डराकर या बदनामी का डर दिखाकर निरंतर उनका शोषण करते है ।
यह बात स्पष्ट है कि इस घिनौने कृत्य पर अंकुश सामाजिक दबाव से ही लग सकता है , अगर ऐसा कोई आपकी नजर मे हो तो इसकी अनदेखी न करें क्योंकि कोई शोषित बच्चा आपका अपना भी हो सकता है ।
याद रखे अत्याचार करने वाले से सहने वाला ज्यादा दोषी होता है , और किसी ऐसे व्यक्ति पर अत्याचार हो रहा हो जो इसका मतलब भी नहीं समझता हो तो उस पर यह अत्याचार होते देखना हमे भी दोषी के वर्ग मे खड़ा करता है ।

Friday, 15 August 2014

Naari

इसे पति की श्रेष्ठता कहो,
या नारी की भक्ति,
या कहो इसे सांस्कृतिक अभिव्यक्ति,
कि जब से हम पैदा हुए हैं,
पत्नी ने ही पति के पैर छुए है |
ऐसा नहीं कि पति के पैर संगेमरमर है,
पर शायद अच्छी संस्कृति का कुछ अंश जर्जर है |
घूँघट, मंगलसूत्र माथे पर सिंदूर पोते गये,
कितने संयम, कितने रीति पत्नियों पर थोपे गये |
उनके स्नेह, करूणा, त्याग ने,
रीतियों को फ़सा लिया,
पत्नियों ने इन्हे,
शृंगार का रूप बना लिया |
भारी शिकायतों को संस्कृति के,
तराज़ू में तोल्ती हैं,
सिर्फ़ हल्की शिकायतें हीं ये पत्नियाँ,
बोलती हैं |
"काश, अगर, क्यों नहीं"- भारी शिकायतों में है,
इन्हे नहीं बोलना- संस्कृति की हिदायतों में है |
कौन कहता है कि संस्कृति बदल दो,
किंतु पतियों की मानसिकता में ज़रा दख़ल दो |
ये दखलअंदाज़ी ज़रा आराम से, प्यार से हो,
पत्नियों द्वारा ही प्रेम के तार से हो |