आने वाले वर्षों मे इस बात की प्रबल संभावना है कि हिन्दी को यू .एन की भाषा बना दिया जाएगा और सरकार हर साल लगभग सौ करोड़ ₹ इस पर खर्च भी करेगी , माननीय प्रधानमंत्री जी जब लाल किले की प्राचीर से अपना भावनाओ से ओतप्रोत भाषण हिन्दी मे देते है तो हमे अपनेपन का बोध होता है । और एक कदम आगे बढ़कर जब महोदय ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी को तहरीज दी और सरकार की नीतियों एवं उपलब्धियो को लोगों तक पहुँचाने के लिए हिन्दी मे वेबसाइट को चालू किया तो हमारा सीना फूलकर 56 इंच का हो गया , लगा मानो हिन्दी के दिन फिर गए ।
लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज हिन्दी अपने ही देश मे पराई है । भाषा का मुख्य मकसद भावनाओं का आदान- प्रदान है लेकिन हमारे देश मे यह बौद्धिकता का भी मापदंड है ,अगर आप रेल्वे के स्लिपर क्लास मे है तो हिन्दी बोल सकते है लेकिन अगर वातानुकूलित डिब्बे मे है तो हिन्दी बोलने पर आपको संदिग्ध निगाहों का सामना करना पडेगा । अचरज तो उस समय होता है जब किसी मल्टीप्लेक्स या फूड चेन रेस्तराँ मे जाने पर अंग्रेजी के कुछ चुनिंदा शब्दों को जानने वाला वेटर आपके द्वारा हिन्दी मे आर्डर दिये जाने पर आपको तिरस्कृत नजरों से देखता है । और हिन्दी माध्यम स्कूलों का तो भगवान ही मालिक है ।
आज लगता है लार्ड मेकाले अपनी उस नीति मे पूर्णतः सफल दिखाई देते है जिसमें उन्होंने काले अंग्रेजो की एक ऐसी फौज बना ली है जो दिखने मे तो भारतीय है लेकिन विचारों से अंग्रेज ।
अंततः हिन्दी , हिंदू , हिन्दुस्तान को आदर्श मानने वाली यह सरकार शायद हिन्दी के उद्धार मे कुछ न कर सके लेकिन कम से कम उसे इतना एहसान तो करना ही चाहिए कि सारे स्कूलों से हिन्दी माध्यम को समाप्त कर अंग्रेजी माध्यम को लाए जिससे प्रतिमाओ को और लज्जित न होना पड़े।
लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज हिन्दी अपने ही देश मे पराई है । भाषा का मुख्य मकसद भावनाओं का आदान- प्रदान है लेकिन हमारे देश मे यह बौद्धिकता का भी मापदंड है ,अगर आप रेल्वे के स्लिपर क्लास मे है तो हिन्दी बोल सकते है लेकिन अगर वातानुकूलित डिब्बे मे है तो हिन्दी बोलने पर आपको संदिग्ध निगाहों का सामना करना पडेगा । अचरज तो उस समय होता है जब किसी मल्टीप्लेक्स या फूड चेन रेस्तराँ मे जाने पर अंग्रेजी के कुछ चुनिंदा शब्दों को जानने वाला वेटर आपके द्वारा हिन्दी मे आर्डर दिये जाने पर आपको तिरस्कृत नजरों से देखता है । और हिन्दी माध्यम स्कूलों का तो भगवान ही मालिक है ।
आज लगता है लार्ड मेकाले अपनी उस नीति मे पूर्णतः सफल दिखाई देते है जिसमें उन्होंने काले अंग्रेजो की एक ऐसी फौज बना ली है जो दिखने मे तो भारतीय है लेकिन विचारों से अंग्रेज ।
अंततः हिन्दी , हिंदू , हिन्दुस्तान को आदर्श मानने वाली यह सरकार शायद हिन्दी के उद्धार मे कुछ न कर सके लेकिन कम से कम उसे इतना एहसान तो करना ही चाहिए कि सारे स्कूलों से हिन्दी माध्यम को समाप्त कर अंग्रेजी माध्यम को लाए जिससे प्रतिमाओ को और लज्जित न होना पड़े।
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