जैसे -जैसे सूर्य की तपिश बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे भारतीय समाज पर शादी का निराला रंग चढता जाएगा , और लोग अनावश्यक खर्चों से खुशी तलाशने मे जुट जाएँगे। ऐसे ही अनावश्यक खर्च एवं महा सामाजिक कुरीति का श्रेष्ठ उदाहरण है दहेज।
दहेज प्रथा की मूल वजह को तलाशा जाए तो पाएँगे एक अदृश्य सामाजिक दबाव जिसमें लोग अपनी झूठी शान को दिखाने के लिए बेहिसाब धन का नुकसान करते है, कई बार देखने मे आता है कि वर पक्ष की तरफ कोई माँग न होने के बावजूद लोग उन्हें दहेज देते है जिसे वे सभ्य समाज मे उपहार कहते है । आर्थिक रूप से मज़बूत परिवार तो इस खर्च को सह लेते है लेकिन वास्तविक दवाब गरीबों पर आता है जिसे समाज मे आपनी अस्मिता बचाए रखने के लिए उधार लेकर भी अपनी विवाह को संपन्न करना होता है ।
यहीं से भेदभाव और प्रबल होता है और लोग कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध करते है ,सामाजिक विषमता उत्पन्न होती है दहेज मृत्यु होने लगती है दहेज प्रथा का एक और नुकसान स्त्रियों को होता है जिससे वे अपने आर्थिक आधार से विमुख होतीं है और अपने परिवार से अपनी संपत्ति को नहीं माँग पाती जो कि उनका वैधानिक हक होता है ।
वैसे इस कुरीति से लडने की बात हर कोई करता है लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थ के आगे हार जाते है क्योंकि आती हुई लक्ष्मी किसे बुरी लगती है , कुछ लोग इस प्रथा को सही साबित करने के लिए वेद, पुराण और इतिहास का सहारा लेते है लेकिन वास्तव मे सब मिथ्या साक्ष्य है ।
इस सभ्य समाज से हटकर अगर हम आदिवासियों के जीवन पर नजर डालें तो पाएँगे कि न तो उनके यहाँ माता पिता अपने बच्चों का बिना मर्जी का विवाह कराते है और न ही दहेज जैसी कुरीति होती है ,,,,,, तो विचार करें सभ्य कौन?
दहेज प्रथा की मूल वजह को तलाशा जाए तो पाएँगे एक अदृश्य सामाजिक दबाव जिसमें लोग अपनी झूठी शान को दिखाने के लिए बेहिसाब धन का नुकसान करते है, कई बार देखने मे आता है कि वर पक्ष की तरफ कोई माँग न होने के बावजूद लोग उन्हें दहेज देते है जिसे वे सभ्य समाज मे उपहार कहते है । आर्थिक रूप से मज़बूत परिवार तो इस खर्च को सह लेते है लेकिन वास्तविक दवाब गरीबों पर आता है जिसे समाज मे आपनी अस्मिता बचाए रखने के लिए उधार लेकर भी अपनी विवाह को संपन्न करना होता है ।
यहीं से भेदभाव और प्रबल होता है और लोग कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध करते है ,सामाजिक विषमता उत्पन्न होती है दहेज मृत्यु होने लगती है दहेज प्रथा का एक और नुकसान स्त्रियों को होता है जिससे वे अपने आर्थिक आधार से विमुख होतीं है और अपने परिवार से अपनी संपत्ति को नहीं माँग पाती जो कि उनका वैधानिक हक होता है ।
वैसे इस कुरीति से लडने की बात हर कोई करता है लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थ के आगे हार जाते है क्योंकि आती हुई लक्ष्मी किसे बुरी लगती है , कुछ लोग इस प्रथा को सही साबित करने के लिए वेद, पुराण और इतिहास का सहारा लेते है लेकिन वास्तव मे सब मिथ्या साक्ष्य है ।
इस सभ्य समाज से हटकर अगर हम आदिवासियों के जीवन पर नजर डालें तो पाएँगे कि न तो उनके यहाँ माता पिता अपने बच्चों का बिना मर्जी का विवाह कराते है और न ही दहेज जैसी कुरीति होती है ,,,,,, तो विचार करें सभ्य कौन?
No comments:
Post a Comment