There is two sides to this story and which could of been prevented if we all learnt to show more Respect to each other. Killing the inocent people was disgusting, and making fun of peoples religeon is not "Freedom of Speech", but bigotry & religeous discrimination.
Friday, 9 January 2015
Thursday, 21 August 2014
माँ
" खुली जब आँख तुझे देखा
ऊँगली पकड़ के चलना सीखा
सीखी तुझसे दुनिया दारी
माँ तू है जग से प्यारी "
माँ एक ऐसा शब्द जिसमे सारी दुनिया समाई है और जिनके पास माँ होती है उनसे ज्यादा खुशनसीब कोई नहीं होता । कभी कभी अनजाने में मैं माँ को बहुत हर्ट कर देती हूँ जिसका मुझे एहसास बाद में होता है इसीलिए मै आज वो लिखने जा रही हूँ जो मैं महसूस तो करती हूँ पर कभी कह नहीं पाती और शायद अपनी माँ से कभी कह भी नहीं पाउंगी। माँ वो है जो हमेशा से हमे एक बेहतर जिंदगी देने कि कोशिश करती है । माँ को चाहे कितनी भी तकलीफ हूँ पर वो मुझे कभी इस बात का एहसास तक नहीं होने देती है। याद आते है वो पल जब में छोटी थी और मेरे एक्साम्स होते थे। एक्साम्स होते तो मेरे थे पर चिंता उन्हें रहती थी ऑफिस से आने के बाद सीधे उनका मुझे पढ़ाने बैठ जाना और रात में मुझे टाइम पर सुला देना। और सुबह होते ही छत पर ले जा के मुझे पढ़ाना । पर शायद अब वो बात नहीं रह गई है ना जाने क्यों हम बदल जाते है किसी और के करीब आने से , ना जाने क्यों मुझे अपने ही मेरे दुश्मन लगने लगते है ना जाने क्यों ??? अब हर चीज़ गलत लगने लगती है यहाँ तक मम्मी का करीब रहना भी उनका कोई सवाल करना भी मुझे बुरा लगता है एक चिड़चिड़ाहट सी होने लगती है ना जाने क्यों ??
समझ नहीं आता क्यों भूल जाते है हम अपने पुराने रिश्तों को जो हमारे सबसे ख़ास होते है , उन्ही से दूर होने लगते है किसी और के लिए हम अनजाने में उन्हें दुखी कर देते है जिन्होंने हमारे लिए ना जाने कितने दुःख सहे होंगे।
" दर्द दिए तुझे एहसास है मुझे
आंखों से बहते आसूं भी याद है मुझे
कर दी गलती कैसे मांगू माफ़ी
मुझको तेरी जरुरत आज भी है "
Saturday, 16 August 2014
कितने मजबूत है आपके रिश्ते ।
हमारे वातावरण मे कुछ ऐसी प्रवृत्ति के लोग रह रहे है जो अपनी हवस को बुझाने के लिए कई बच्चों की उम्मीद और हौसलो के दिये को सदैव के लिए बुझा देते है , और भर देते है उनमे कुंठा , घुटन और ग्लानी ।
नज़दीकी रिश्तों मे अगर कोई लडका जब किसी लडकी से उम्र मे 12-15 साल बडा हो और लडकी को प्रेम जाल मे फसाकर उसका यौन शोषण करता हो तो क्या माना जाए इसे । आश्चर्य तो तब होता है जब वो यौनिकता को सार्वजनिक करके लडकी का मजाक बनाता है ।
लेकिन बाल शोषण मात्र यहीं तक सीमित नहीं कई बार देखने मे आता है कि ऐसे लोग जो बच्चे के बहुत नजदीकी है या परिवार मे आते जाते रहते है भी इस घिनौने अपराध को अंजाम देते है ।
ये बच्चों को डराकर या बदनामी का डर दिखाकर निरंतर उनका शोषण करते है ।
यह बात स्पष्ट है कि इस घिनौने कृत्य पर अंकुश सामाजिक दबाव से ही लग सकता है , अगर ऐसा कोई आपकी नजर मे हो तो इसकी अनदेखी न करें क्योंकि कोई शोषित बच्चा आपका अपना भी हो सकता है ।
याद रखे अत्याचार करने वाले से सहने वाला ज्यादा दोषी होता है , और किसी ऐसे व्यक्ति पर अत्याचार हो रहा हो जो इसका मतलब भी नहीं समझता हो तो उस पर यह अत्याचार होते देखना हमे भी दोषी के वर्ग मे खड़ा करता है ।
Friday, 15 August 2014
Naari
या नारी की भक्ति,
या कहो इसे सांस्कृतिक अभिव्यक्ति,
कि जब से हम पैदा हुए हैं,
पत्नी ने ही पति के पैर छुए है |
ऐसा नहीं कि पति के पैर संगेमरमर है,
पर शायद अच्छी संस्कृति का कुछ अंश जर्जर है |
घूँघट, मंगलसूत्र माथे पर सिंदूर पोते गये,
कितने संयम, कितने रीति पत्नियों पर थोपे गये |
उनके स्नेह, करूणा, त्याग ने,
रीतियों को फ़सा लिया,
पत्नियों ने इन्हे,
शृंगार का रूप बना लिया |
भारी शिकायतों को संस्कृति के,
तराज़ू में तोल्ती हैं,
सिर्फ़ हल्की शिकायतें हीं ये पत्नियाँ,
बोलती हैं |
"काश, अगर, क्यों नहीं"- भारी शिकायतों में है,
इन्हे नहीं बोलना- संस्कृति की हिदायतों में है |
कौन कहता है कि संस्कृति बदल दो,
किंतु पतियों की मानसिकता में ज़रा दख़ल दो |
ये दखलअंदाज़ी ज़रा आराम से, प्यार से हो,
पत्नियों द्वारा ही प्रेम के तार से हो |
Wednesday, 11 June 2014
A speechless girl
With plaited braid
No voice to say
Thousand dreams she make
In her own small world
She lived carefree
Where no dream broke
And no pain exist
In tales of wonderland
She found her home
Unaware of surround
How realities take turn?
She grew in dreamy world
With princess pace
She became a lady
With dignity and grace
She is a silent lore
With smiles in store
Curing all worries
With caring strokes
Her touch of sympathy
Creates soft miracle
With her words of belief
Even pain gets baffled
She act in magic
Because she lived in it
Her touch is angelic
She has fairies trick
She can do wonder
As she believe in them
Once lived in fairy land
Now creating land of magic………………
Monday, 26 May 2014
अपंग कौन व्यक्ति या समाज ?
लोगों से अलग होना हर ईंसान की ख्वाहिश है , हम सब एक दूसरे से कई मामलों मे विभिन्नता रखते है लेकिन जब कोई व्यक्ति सुन नहीं सकता , बोल नहीं पाता , चल नहीं पाता या अन्य पैमाने पर अलग हो तो यह भिन्नता अपंगता मे बदल जाती है ।
हमारे समाज मे अपंग होना एक औरत होने से भी खराब माना जाता है और अपंग अगर स्त्री हो तो यह स्थिति बद से बदतर हो जाती ।समाज मे अपंगता का आशय दया , असहाय, और बेचारगी से लगाया जाता है ।लोगों की दृष्टि मे ये लोग बोझ और सहानुभूति के पात्र माने जाते है ।
लेकिन कहते है कि जब कुदरत कोई चीज़ छीनती है तो उसके बदले कुछ ना कुछ ऐसा देती है जो दूसरो पर न हो , बस इसी हुनर की पहचान उन्हें करनी होती है और वे इस अपंगता को वरदान मे बदल देते है और समाज को नई राह सुझाते है ।ये लोग किसी भी प्रकार की दया के मोहताज नहीं है बस इन्हें प्रेम एवं समाज मे स्वीकार्यता की आवश्यकता है जिससे ये अपने वजूद को पहचान सकें।
वास्तव मे दया के हकदार तो वो लोग जो समाज मे अराजकता को फैलते , मानवता को दागदार करते है और अपंग न होते हुए भी अपंग बने हुए है और कैंसर कोशिका की तरह समाज मे उपस्थित है ।
Sunday, 11 May 2014
मुझे जीने दो
मुझे जीने दो।
लिए । आज भी हमारे समाज मे लड़की अपने घर वालो पर एक स्वाभाविक बोझ ही मानी जाती है , कई घरो मे ये भेदभाव से संबंधित नहीं है लेकिन ये सामाज मेँ चलीं आ रहीं एक प्रथा है । यहाँ किसी भी पक्ष को निज़ी स्तर पर गतल नहीं ठहराया जा सकता पर व्यक्ति की स्वतंत्रता पर ऐसे रोक लगाना कहा तक जायज़ है ।
दरअसल यहाँ एक समाज का दबाव काम कर रहा है एक ऐसा हिंसक सामाजिक दबाव जो पिता को हर सामाजिक कार्यक्रम मे यह सुनने पर बेबस करता है कि अब तो बेटी की शादी करवा दो , जो माँ के कानों तक उन बातों को पहुचाता है जिसे वह अपने बच्चों के लिए कभी नहीं सुनना चाहती । लड़की इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ है कि बिना नौकरी उसकी स्थिति बिलकुल अपनी माॅ की तरह होगी , लेकिन नौकरी करके वह कुछ तो परिवर्तन लाएगी , हाँ यहाँ किसी तरह की क्रांती नहीं होगी बस पैसे कमाने के चलते वो आर्थिक तौर पर मज़बूत होगी और अपने वजूद को पहचान पाएगी ।
ऊपर लिखी ये बाते किसी कहानी की तरह लगती है लेकिन है नहीं , यह उन हजारों लड़कियों की कहानी जो रोज इसी प्रकार कि दुविधा का सामना करती है जिनमें से कुछ को आप भी जानते होंगे । ये लडकियाँ दो तरफ से दबाव मे होती है पहला तो परिवार का और दूसरा शिक्षा , हम इन्हें शिक्षा एवं अन्य कारण से तो मुक्ति नहीं दिला सकते लेकिन इनका पारिवारिक बोझ अवश्य कम कर सकते है क्योंकि यह संभव है कि इनमें से कोई आपकी बहन या परिचित हो।